Thursday, September 16, 2010

" गायत्री वह दैवी शक्ति है जिससे सम्बन्ध स्थापित  करके मनुष्य अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्त कर सकता है ".  (प .पु . पंडित श्री राम शर्मा आचार्यजी )

जय गुरुदेव.........

        वह शक्ति जिसकी स्तुति करके साधक मोक्ष प्राप्त करते है वही आदि शक्ति है गायत्री. यह कोई देवी या देवता नहीं किन्तु स्वयं ब्रह्म की क्रियाविधि है  . ब्रह्म विरक्त है वह तो सिर्फ अपनी उत्पन की गयी शक्तिओ का आनंद लेता है . उसी ब्रह्म से उत्पन हुई आदि शक्ति का नाम है गायत्री जिस से  सारी शक्तियां प्रकट हुई है . इसलिए गायत्री को माता कहा जाता है. अनेक ब्रह्मांडीय शक्तियों  की जनेता गायत्री शक्ति ही है .इन्ही  के स्मरण मात्र से चारो वेदों की रचना हुई है इसलिए इन्हें  वेदमाता कहा जाता है . गायत्री शक्ति ब्रह्माण्ड में विचरित प्रत्येक जीवो  (चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म ) की प्राणवह माता  है.
       गायत्री शक्ति से ६ महाशक्तिया प्रकट हुई है क्रमशः परा शक्ति, ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति, कुंडलिनी शक्ति और मात्रिका शक्ति और यह शक्तिया ही ब्रह्माण्ड की उत्पति का कारण है .
       अब हम यह जाननेकी कोशिश करते है  की यह शक्तियो का मनुष्यों के साथ क्या सम्बन्ध है ?

परा शक्ति : यह शक्ति को हम दुर्गा, काली, सीता, राधे के नाम से जानते है. जो ब्रह्म स्वरुप है, तेजोमय है, यही परमानन्द है, सारी शक्तिओ का मूल स्वरूप परा शक्ति ही मनुष्य में स्थित आत्मा का ब्रह्म से मिलन कराती है .

ज्ञान शक्ति  : विद्या तत्त्व , यह शक्ति सत्य का ज्ञान है जिसका मूल सारी विध्याए है, इसके दो रूप है,  एक... मनुष्य के ३ गुणोंसे से मिलकर मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार में बदल जाती है, और दूसरी... श्रेष्ठता पाकर शुद्ध ज्ञान में बदल जाती है जिससे मनुष्य अनेक  सिद्धियो  का स्वामी बनजाता है .

इच्छा शक्ति : यह शक्ति की उत्पति ब्रह्म से नहीं किन्तु गायत्री से है. यह मनुष्य की तमाम नाड़ियो में विचरण करती है. यह शक्ति दिमाग की सुचना शारीर के प्रत्येक कोशो तक पहुचती है. यह शक्ति यदि ज्ञान शक्ति के रजो  गुण या तमो गुण से प्रभावित है तो यह मनुष्य में भुगतना, सहना, पीड़ा जैसी यातना  को जन्म देतीहै  और अगर सतो गुण से प्रभावित है तो आनंद ,ख़ुशी ,दया ,उल्हास को जन्म देती है . मनुष्य  के सारे अच्छे या बुरे कर्मो का कारण इच्छा शक्ति ही है.

क्रिया शक्ति : यह शक्ति इच्छा शक्ति की सहायक शक्ति है . यह मुष्य को अपने अच्छे या बुरे कर्मो का फल देती है . यह सतो गुण के प्रभाव में अच्छे कर्म और तमो गुण के प्रभाव  में बुरे कर्मो की उत्तरदायी है . यह शक्ति  सत गुण के प्रभाव में मनुष्य को समाज के हित के कार्य करने को प्ररित करती है . इसी से मनुष्यो  को सारी अलौकिक सिद्धिया  प्राप्त होती है.

कुंडलिनी शक्ति : कुंडलिनी शक्ति के दो स्वरुप है , एक ब्रह्मांडीय कुंडलिनी शक्ति और दूसरी व्यक्तिगत कुंडलिनी शक्ति, ब्रह्मांडीय  कुंडलिनी शक्ति जो प्राण स्वरूप है प्राणवह है, ब्रह्माण्ड की सारी शक्तिया जैसे की प्रकाश,चुम्बकीय, विद्धुत,गर्मी,अग्नि,विकिरण शक्तिया  इसी से उत्पन हुई है. यह  शक्ति से ब्रह्माण्ड के सारे सूर्य,नक्षत्र, ग्रह चालित है, इसी शक्ति से पृथ्वी की सजीव सृष्टि प्राणउर्जा ग्रहण करती है .
            व्यक्तिगत कुंडलिनी शक्ति मनुष्य के मूलाधार चक्र  में  व्यक्तिगत रूप से सुसुप्त अवस्था में ब्रह्माण्ड से घनीभूत होकर सो रही है. इसी से मनुष्य में संकल्प शक्ति और निर्णय शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है जो अन्य जीवो में नहीं मिलता. इसी की वजह से मनुष्य हर जीवो से  श्रेष्ठ है और शक्तिमान  है.इसी से मनुष्य शरीर को ब्रह्माण्ड का स्वरुप माना जाता है. 
             यह मनुष्य में व्यक्तिगत रूप में बुद्धि एवं वृति को उभारती है इसी से प्रत्येक मनुष्य दुसरे मनुष्य  से भिन्न स्वाभाव का नजर आता है. अन्य  जीवो में यह लक्ष्निकता  नहीं देखि जाती.  यह शक्ति मनुष्य के मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर को एक लोक से दुसरे लोक में विचरण कराती है और मनुष्य के पुन:जन्म का कारण  भी यही है.
             अगर कुंडलिनी शक्ति किसी मनुष्य में पूर्ण जागृत हो जाती है तो उसके सारे विकार नष्ट  कर देती है जैसे की काम,क्रोध,मद,लोभ,दंभ,दुर्भाव,द्वेष,वासना लकिन जब तक शरीर पूर्ण शुद्ध नहीं होता यह जागृत नहीं होती.
             यदि मनुष्य का मन, अन्तकरण अशुद्ध है और उसकी कुंडलिनी शक्तिपात करती है तब उसमे राक्षसी वृति का प्रादुर्भाव होता है और वह संसार के लिए हानिकारक बन जाता  है, वर्तमानकाल में आतंकवाद इसका उदहारण है. लेकिन मनुष्य का मन अन्तकरण शुद्ध है और कुंडलिनी शक्तिपात करती है तब वह विलक्षण प्रतिभावान वृति वाला होजाता है जैसे कई संत, लोकसेवक ,नेता इसके उदहारण है .

मात्रिका शक्ति : यह शक्ति से नाद, शब्द,गायन,राग, रागिनी, संगीत प्रकट हुए है, सारे मंत्र इसी शक्ति को जागृत करते है. यह शक्ति के जागृत होने से इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति सात्विक बनजाती  है. कुंडलिनी शक्ति भी इस शक्ति के बिना जागृत नहीं होती, इसी लिये  इसे शब्द ब्रह्म भी कहा जाता है.  ब्रह्माण्ड के सारे नाद इसीसे उत्पन हुए है और सारे बिज मंत्र इसके अंग अवयव है.
              यदि मनुष्य इस शक्ति को भक्ति एवं प्रेम से जागृत करता है तो धीरे धीरे यह मनुष्य के सारे बुरे कर्मो को जलादेती है और उसे मोक्ष दिलाती  है, लेकिन यदि मनुष्य इसे हानि पहुचने की वृति से या अहंकार युक्त होकर जागृत करता है तो यह उसे नष्ट कर देती  है.
          गुरुदेव कहते है गायत्री ही वह शक्ति जो अपने ६ रूपोमे प्रत्येक मनुष्य में वास करती है इसको पहचान कर इसके सदुपयोग से मनुष्य अपने जीवन का विकास बड़ी आसानी से कर सकता है .

No comments:

Post a Comment